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बालकनी

Discussion in 'Stories in Regional Languages' started by wisha, Apr 7, 2010.

  1. wisha

    wisha Senior IL'ite

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    आँख खुलते ही मेरी नज़र शांतनु के चेहरे पर पड़ी.. खुली खिडकी से सूरज कि किरणें उनके चेहरें पर आ रही थी| आज भी उनका चेहरा किसी बच्चे सा निष्पाप लगता है| कल रात ,उन्हें बहुत देर तक नींद नहीं आई थी, बाप बेटे जब भी एक मत नहीं होते तो शांतनु का यहीं हाल होता है| बेटा कोई भी बात दिल पर नहीं लेता, दूसरे ही दिन पिता से वैसे ही बातें करने लगता है जैसे वो दोनों बचपन के मित्र हों| जीवन के २५ साल बिताएँ हैं शांतनु के साथ पर ऐसा लगता है, हर बीतते साल के साथ मैं बड़ी होती गयी और वो छोटे|शादी हों कर जब मैं आई थी तो...

    "कहाँ खो गयी शलभा ,मुझे उठाया क्यों नहीं,ऑफिस के लिए लेट हों जाऊंगा" शांतनु के इस प्रश्न को सुनते भी अब बरसों हों गए,ये अलग बात है कि इन बरसों में वो कभी भी ऑफिस के लिए लेट नहीं हुए|

    "अभी सुबह के ६ बजे हैं, ऑफिस आप ९ बजे ही जाओगे ना" ये कहते हुए मैं बालकनी कि तरफ बढ़ गयी|

    शांतनु भी उठ कर बाथरूम कि तरफ चल दिए|

    मुझे मेरी बालकनी बहुत पसंद है, हर सुबह हल्की हवा के साथ झूमता नीम, एक ऐसी शुद्ध साँस भरता है,जो मन को भी शुद्ध कर देती है|जीवन भी ऐसा ही है, इसके कड़वे अनुभव जीवन को शुद्ध कर देतें हैं,नए अनुभवों और नई सफलताओं को अपने अंदर भर लेने के लिए|पंक्षियों की चहचहाहट के बीच अपनी धुन गुनगुनाते हुए ,मैंने चाय का पानी चढ़ा दिया| फिर लग गयी नाश्ते की तैयारी में|

    तब तक शांतनु भी तैयार हो के निकल चुके थे|वो अपना अखबार ले कर बैठ गए|नाश्ते के साथ चाय.वही शांतनु की खिट-पिट,"तुम भी नाश्ता क्यों नहीं कर रही,किस भगवान ने कहा है, भूखे पेट पूजा करो|तुम अपना बिलकुल ध्यान नहीं रखती,इतने साल हो गए|समझाते समझाते मैं बुढा हो गया|"

    अक्सर मैंने घरों में औरतों को इतना ध्यान रखते देखा है, पर हमारे घर में उल्टा है| मुझे कभी इस बात से खुशी होती है ,कभी शर्मिंदगी| अक्सर जो चीज़ें अलग होतीं हैं,वो आम लोगों के बीच हास्यास्पद भी हो जाती हैं|

    अभी मैंने शांतनु को कुछ कहना चाहा कि फोन की घंटी बजी| मुझे पता था ये बेटे का ही फोन होगा,फिर कल की बात भूलकर वो पिता को हँसाने लगा और चंद मिनटों में, शांतनु ने मेरी शिकायत करनी शुरू की और मैं समझ गयी, हो गया मिलाप| अच्छा है,अब इनका दिन अच्छा रहेगा|

    बात खत्म हुई और, अपना बैग उठा ये ऑफिस को निकल गए| मैंने चाय और अखबार उठाया और बालकनी में जा कर बैठ गयी| चाय के साथ अखबार की चुनिन्दा खबरों को पढ़ कर लग गयी अपनी दिनचर्या में|

    नाश्ता खत्म किया था कि बाई आ गयी|सावित्री, मेरी बाई,नई शादी की जिम्मेदारियों से त्रस्त रहती है|इसलिए उसे आते हे चाय की प्याली और टोस्ट देना मैं नहीं भूलती| फिर कभी कभार उसकी अनवरत शिकायतें सुन कर उसका मन हल्का करने में भी योगदान दे देती हूँ| आज बहुत थकान है, शांतनु को समझाने का प्रक्रिया और कम नींद ने मेरी आँखों को बोझल कर रखा था|

    अपनी आराम कुर्सी पर बैठ कर याद करने लगी,उन पूराने दिनों को जब मैं शादी हो कर आई थी,जरूरत से ज्यादा बचपना या यूँ कह लूँ जिम्मेदारियों और दुनियादारी की समझ ही नहीं थी|कुछ करना चाहती,कुछ हो जाता,कुछ कहती और कुछ समझा जाता|शांतनु ने प्रत्यक्ष तो नहीं पर परोक्ष रूप से हमेशा उसके साथ दिया|मुझे समझते और समझाते जिंदगी के इतने वसंत बीत गए| जिंदगी के मुश्किल दिनों में वही तो अपने धैर्य का संबल मुझे देते रहे| फिर उन परेशानियों ने व्यावहारिकता का पाठ पढाया|

    मुझे आज भी याद है,जब शादी के बाद मुझे ठण्ड लग गयी थी|

    शांतनु ने पूरा घर सर पर उठा लिया था, कभी काढ़ा ,कभी विक्स,कभी तेल| साथ में वही लाईनें"तुम अपना बिलकुल ख्याल नहीं रखती"|

    "मेमसाब मैं जाऊं?", सावित्री जाने को तैयार खड़ी थी|मैं पुरानी यादों से बाहर आ गई|

    "थोडा सरसों पीस दे सावित्री, आज पनीर की सरसों वाली सब्जी बनानी है" मैं सरसों निकाल कर देने लगी|

    कल मिक्सी खराब हो गयी, सावित्री को भी अपनी बातें कहने का मौका मिल गया|

    वो शुरू हो गयी"क्या बोलूं मेमसाब, आपके पास आ कर मेरे को कितना अच्छा लगता है|अपने घर में तो पुरे दिन कीच-कीच हे होती रहती है| मेरे लिए कोई कुछ नहीं करता, पर सब को मेरे से बहुत डिमांड है|किसी को ये चाहिय, किसी को वो|ऊपर से टाइम के ऊपर सोलिड मगजमारी|दिन के ४८ घंटे भी इनकी नौकरी बजाओ ना तो भी मेरी फॅमिली को कमइच् पड़ेगा| पता होता की शादी का मतलब ये है तो कभी शादी हे नहीं करती मैं| मेरे बाबा की तबियत इतनी खराब की क्या बताऊँ, पर इतना टाइम ही नहीं कि उसे एक बार देख आती| तुमसे तो छुट्टी ले भी ले, घर से छुट्टी नहीं मिलने वाली मेमसाब|क्या करे, अभी लगता है, इसलिए पहले लोग बेटी को अफीम चटाते होंगे,शादी के बाद बेटी किस काम की रहती है| पाल पोस कर बड़ा करो,शादी होते ही मरा मान लो| माँ बाप को ऐसे भूल जाओ ,जैसे वो दुनिया में हो ही नहीं|तुम तो नासिबवाली है मेमसाब,साहब तुम्हारा कितना ख्याल रखता है",इतना लगातार बोलने के बाद वो रुकी तो मैंने एक लंबी साँस छोड़ी|उसके उस रोष ने सरसों को अच्छे से पीसने में भी मदद कर दी थी शायद|

    "सावित्री, देख लोगों से अपनी तुलना मत कर, अपने लिए खुश रह|कुछ खायेगी और?"मैंने पूछा|

    सावित्री पनियाई आँखों से देखते हुए बोली,"तुम कितनी अच्छी है मेमसाब, मेरी माँ जैसा ख्याल करती| कुछ नहीं खायेगी मैं, खुश होने के लिए इस दरवाजे से आना ही काफी है|कुछ खाना नहीं|"फिर एक हल्की मुस्कान के साथ सावित्री चली गयी|मन पर फिर यादों के बादल छा गए....

    बृहस्पतिवार कि सुबह थी वो,मेरा उपवास रहता था|गयी रात शांतनु से अच्छी खासी बहस हो गयी थी| मुझे उनका ये तर्क समझ नहीं आता था, कि कोई कुछ भी करे ,हमें अच्छा हे करना चाहिए| जब हम जान रहे है कि सामने वाला गलत है तो भी हम नहीं बोल सकते, क्योंकि वो अपने है| कई बार शांतनु ने ऐसी बातें जानी थी,जो उनसे छुपाई जाती थीं| कई बार इन अपनों के मुंह से ही ना सुन चुके हैं शांतनु| हर बार आहत होते, तब पहले चुप्पी और फिर बोल कर अपना ह्रदय मेरे सामने खोल देते|

    पर उस दिन तो हद ही हो गयी थी, उनके एक मित्र ने यह कह कर पैसे लिए कि उसे अपने पिता का इलाज़ कराना है, बाद में पता चला, उसे नई गाड़ी लेनी थी|

    कितने आहत हुए थे वो यह जानकर"सुधाकर सच कहता तो क्या मैं उसे पैसे नहीं देता शलभा, सबसे अच्छा दोस्त है वो मेरा|पता है हमने साथ साथ १५ साल गुजारें हैं,स्कूल से इंजीनियरिंग कॉलेज तक|क्या मैं उसकी नई गाड़ी से जलता,अरे मुझे तो लगता मैंने भी गाड़ी खरीद ली"|

    "इसलिए नहीं बताया होगा" मैं गुस्से में कुनमुना कर रह गयी थी|कैसे कहती कि लोग तुम्हारी अच्छाई का फायदा उठाते हैं|अब तो समझिए शांतनु| वैसे भी इस बात का शांतनु के पास एक ही उत्तर होता ,दुनिया चाहे जैसी हो,मैं किसी से ना बुरा कहूँगा ना बुरा करूँगा|अच्छे लोगों के साथ अच्छा ही होता है|

    दूसरे दिन वही सुधाकर पान चबाता हुआ आ कर बोला"क्या करू शांतनु भाई,बाबूजी कि बड़ी इक्षा थी कि अपनी गाड़ी पर घूमें|आधी बीमारी तो मन कि होती है ना,तो गाड़ी से अच्छा इलाज़ क्या होता|सो मैंने सोचागोली मारों डॉक्टरों और दवाओं को गाड़ी ले ली| एकदम अंतिम क्षण का निर्णय था,वरना मजाल है ,तुमसे पूछे बिना,मेरे घर का पत्ता भी डोले|हम दोनों जिगरी हैं यार,१५ साल का रिश्ता कोई मजाक है क्या|"

    शांतनु ने मेरी तरफ देखा,मानो कह रहे हो"मैं ना कहता था"|

    मैं सर पिट लेती|कभी इनको चेताती भी तो उलटे मुझसे लड़ पड़ते"मुझे मेरे अपनों के बारे में कुछ नहीं सुनना"|

    सुधाकर और सुधाकर जैसे ना जाने कितने, जीवन में आते रहे पर शांतनु ने ना अपनी अच्छाई छोड़ी, ना बस मुझसे ही लड़ने का अधिकार|

    शांतनु के ये शब्द बार बार दुहराए गए क्योंकि जिसे वो गलती ही नहीं मानते थे वो सुधारी क्या जाती|

    हाँ मेरे दो पहलु हो गए,कभी घर का आधार ,कभी घर का दरवाज़ा|मैं कभी समझ ही ना पाई कि मैं उनकी क्या हूँ|

    बरसों बाद, फिर वही बातें याद कर मेरा मन भी उदास सा हो गया| कैसे मैं भी परेशान रहती थी|तब शांतनु ने मेरे ड्रेसिंग टेबल पर,सिंदूर की डिबिया से दबाकर एक खत छोड़ा था,आज भी वो मेरे गहनों के डब्बे में रखा है|बहुत संभाल कर रखा है मैंने| पीला पड़ा कागज और धूमिल होती स्याही हमारे प्रेम के प्रतिक हैं|हर बार उस पूराने पत्र को पढकर, मैं अपने अंदर एक नए विश्वास को पाती हूँ|इतनी बार पढ़ा है कि वो मेरी स्मृति में अक्षरश: अंकित हो गया है|फिर भी उसके स्पर्श को मन लालायित हो उठा|खोल के गहनों का डब्बा ,बैठ गयी मैं उस खत को लेकर...

    मेरी अपनी शलभा,


    मैंने जीवन में कई उतर चढाव देखें हैं|मुझे प्रेम से ज्यादा जिम्मेदारियों का अनुभव है|

    मैंने अधिकारों से ज्यादा कर्तव्यों को जाना है|

    ये नहीं कहता कि मुझे कम प्यार मिला, पर मैंने अपने से ज्यादा अपनों को प्यार मिले इसका प्रयत्न किया है|

    जब तुम मेरी जिंदगी में आई तो वो तुम ही थी,जिसके लिए मैं इस संसार का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गया|

    फिर तुम्हे मेरा हित ही सर्वोपरि लगने लगा| मैं जानता हूँ कि तुम्हे लोगों का मुझे छलना अच्छा नहीं लगता|

    तुम्हे क्या लगता है,मुझे ये समझ नहीं आता| इस दुनिया को मैं उतना तो जानता ही हूँ जितना तुम जानती हो|

    शायद तुमसे ज्यादा जानता हूँ...

    मैं किसी को कुछ नहीं कहूँगा, क्योंकि अपनों का हित भी अपना ही हित है|

    मेरी यहीं अच्छाई मेरा इश्वर है,वो हमेशा मेरे साथ है|

    रही बात तुमसे आज सुबह के, और उसके पहले के,और आने वाले सारे झगडों का एक ही उत्तर है|

    तुमसे कुछ भी कह सकता हूँ, गलत हो कर भी लड़ सकता हूँ|

    क्योंकि तुम मेरी सबसे अपनी हो|

    आज और आने वाले कई वर्षों के लिए तुमसे बस तुमसे लड़ने का एकाधिकार मांगता हूँ|

    झगडे के साथ तुम्हारा प्यार मांगता हूँ|

    आशा है तुम समझोगी या यूँ कहूँ तुम्हे समझना ही होगा...


    तुम्हारा ,

    शांतनु

    तब से आज तक ,मैं जानती थी,जानती हूँ और जानती रहूंगी कि इतना प्यार शायद ही कोई अपनी पत्नी से करता होगा जितना शांतनु ने किया है| इस प्यार का नतीजा था ,मेरा बेटा अग्रिम और बेटी अस्मि|शायद ये शांतनु कि अच्छाई ही थी,जिसके फलस्वरूप मेरे बच्चों को अच्छे संस्कार और स्वर्णिम भविष्य मिला|

    बच्चों को भी पिता में एक अच्छा दोस्त मिला और मुझमें बस माँ| फिर भी उन्होंने कभी शिकायत नहीं की,गुजरते सालों में मैं बड़ी और उनके पापा बच्चे बनते चले गए|मेरा घर ,खुशियों का डेरा बनता गया|

    हाँ,बच्चों ने भी अपनी मनमानी की| अग्रिम ने जब अमेरिका जाने का निर्णय लिया तो शांतनु इस बात के लिए तैयार नहीं थे| उन्हें अपने देश को छोडकर जाना मूर्खता लगती थी| अग्रिम जाना चाहता था| और उस रात..

    "शलभा, क्या मेरे बच्चे भी, मेरी बातों का महत्व नहीं देते? क्या मेरे प्रति उनका प्यार भी बस दिखावा है",उनका स्वर भीगा सा था|

    "आप तो मुझे सिखाते थे,किसी से कुछ आशा ना रखो, फिर बच्चों से कैसी आशा, यहीं आशा तो दुःख का कारण है ना|हमारा बेटा अपने सपने पाना चाहता है,वो हमें छल नहीं रहा| उसने अपनी सच्चाई रक्खी हमारे सामने|वो भी हमें उतना ही प्यार करता है,जितना हम उसे|फिर क्यों हम उसके पैरों की बेडियाँ बने|मुझे पता है कि आपकी अच्छाई उसे हमेशा सही राह पर ले जायेगी|दूरियां दिलों से होती हैं,ये आपसे ज्यादा कौन समझ सकता है|पास रहकर भी कितने रिश्तों ने साथ दिया हमारा?"मैंने एक निस्वास के साथ बात खत्म कर दी थी|

    दूसरे दिन जब अग्रिम ने अपने पापा को अपने हाथ की चाय और मसाला चिप्स से मना लिया|

    फिर शांतनु की आँखों ने कहा"मैं ना कहता था"|

    अस्मि को लेकर शांतनु बहुत भावुक हैं,जब उसकी शादी की बात शुरू करती थी तो उठ कर चल देते थे|संयोग से उसके लिए एक रिश्ता आया,और अस्मि को भी लड़का पसंद आ गया|इतना अच्छा रिश्ता पा कर हम सभी खुश थे| पर शांतनु की खुशी पर गंभीरता का आवरण चढ़ने लगा| पापा-बेटी के बीच होने वाले उन हँसी ठहाकों में विराम आ गया| एक तो अस्मि, शादी की तैयारियों में व्यस्त थी,और दूसरा नए रिश्ते जब बनतें हैं,तो उनको बनाने और सँवारने में ही हम व्यस्त हो जातें हैं| पीढ़ी चाहे कोई भी हो,ये चीज़ नहीं बदलती|

    अस्मि की सगाई के बाद रात को, शांतनु बच्चों की तरह फुट फुट कर रो पड़े|महीनो से बंधा धैर्य जवाब दे चूका था|

    "मेरी बेटी परायी हो गयी शलभा,वो लोग भी उसे वैसे ही छिन लेंगे,जैसे मैंने तुम्हे तुम्हारे परिवार से छिन लिया था|मुझे माफ कर दो शलभा|मैंने ऐसा जान बुझ कर नहीं किया था| वो तो मैं अपने परिवार को आहत करने से डरता था|शायद,तुमसे दूर होने से मुझे डर लगता था ,मुझे उस अकेलेपन से डर लगता था|इस लिए मेरी बेटी को अब खोना पड़ेगा,मुझे भी वही संताप झेलना होगा|"

    उनकी दशा देख मैं भी रो पड़ी| लेकिन फिर खुद को संभाला और शांतनु को गले लगा लिया|

    "पता हैं, मेरे पिता और मैं दोनों ही आप पर बहुत गर्व करतें हैं|आपने कभी जबरदस्ती नहीं की आग्रह किया| मैंने आपका आग्रह इसलिए माना क्योंकि वो तो बस आपके प्रेम का प्रतिदान था|दोनों तरफ की जिम्मेदारियों में हमने एक को ही शायद चुना हो, पर उसे हमने सच्चाई से निभाया|मुझे इसकी खुशी भी है और गर्व भी|हो सकता है ,हमारी बेटी को इनमें संतुलन कर ले| ना भी कर पाई तो भी, अपने घर में वो खुश रहे मैं बस इसी की इक्षा रखती हूँ | एक मैं हूँ जो पिछले २४ सालों से साथ हूँ, मेरे लिए तो कभी आँसू नहीं बहाते और २२ साल की बेटी के लिए इतने आँसू|हाँ हाँ ,वो तो आपकी बच्ची है और मैं तो किसी और की बच्ची हूँ ना|"मैंने बचपने से कहा और वो हँस पड़े|

    "बच्ची नहीं अब तुम बूढी हो मेरी जान, वो भी इस बूढ़े की बूढी" ,शुरू हो गयी शलभ की छेड़-छाड|

    फिर तो पूरी शादी तक वो व्यस्त पर खुश रहे| विदाई के दिन दोनों पापा-बेटी खूब रोये,पर इस में खो देने का डर नहीं था|

    मुश्किलें आई और आती रही, नए सदस्य घर में जुड़े दामाद और बहु के रूप में और अब तो तीसरी पीढ़ी भी आ गयी है| ना शांतनु बदले, ना उनके प्यार का अंदाज़| हाँ मैं बदल गयी इन २५-२६ सालों में,पर वो बदलाव तो ऐसा था जैसे लहराते आँचल को समेटकर उसे झोली बना लेना और भर लेना ढेर सारी खुशियाँ|

    खिडकी से आई एक पानी कि बूँद मेरी बंद पलक पर पड़ी और मुझे वर्त्तमान में वापस ले आई..

    "अरे,बादल घिर आये हैं,बारिश होने ही वाली है| बालकनी से आचार हटाने होंगे| कपडे भी पड़े हैं, उन्हें भी हटाना है|"सोचते हुए मैं बालकनी की तरफ भागी,सारा सामान जल्दी हटाया और ये रिमझिम फुहार शुरू हो गयी,मैं वही खड़ी होकर गर्मी की पहली बारिश को देखने लगी| ये बारिश तन मन सब के ताप हरने वाली थी,गर्म धरती के भीगने से उठती सोंधी खुशबू ने बचपन की याद दिला दी| फिर मैं ५५ से १६ की हो गयी| बूंदों से खेलने लगी|

    आज लगता है, हम औरते भी इन बालकनियों की तरह हैं, जो यूँ तो नीव से जुडी हुई भी हैं और आसमान को खुलती भी हैं| पर ना उनका अपना आधार होता है ना आसमान| फिर भी इस बालकनी में हमारे खट्टे अचार और मीठी चाय की चुस्कियां ली जाती हैं| ये बालकनी घरों को ऊष्मा देती है और हम औरतें घरवालों के ह्रदय को| आजकल जहा डब्बे जैसे घर और दिल दोनों हैं वहाँ बिना एक बालकनी के घर क्या घर रह पायेगा|

    "अरे, तुम भींग रही हो|ठण्ड लग जायेगी"ये शांतनु का स्वर था,कार गेट पर ही थी और इनका शोर शुरू हो गया था|आज ये शोर मुझे वायलिन की धुन की तरह लग रहा था|

    मैंने पकोड़े तलने शुरू कर दिए और म्यूजिक प्लयेर पर गाना लगा दिया"जब तुम होगे ६० साल के और मैं होंगी ५५ की..."
     
  2. vinoran

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    Could you kindly tell us what language and fonts you are using. I can see only the machine language
    Thanks
    vinoran
     
  3. wisha

    wisha Senior IL'ite

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    Its in hindi...its visible for me.. Might be some language support issue.

    Thanks,
    Wisha
     
  4. kswati

    kswati New IL'ite

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    I landed upon this post accidentally today. A very good post and felt nice to read in Hindi.
    swati
     

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